आंदोलन के दौरान मारे गए गूजरों के शव जयपुर, बयाना और सिकंदरा में रखे हुए हैं और अभी तक उनका पोस्टमार्टम नहीं हुआ है।
इस बीच गूजरों का आंदोलन जारी है। और अब तक गूजरों और सरकार के बीच वार्ता की शुरुआत नहीं हो सकी है।
शुक्रवार को सवाई माधोपुर में पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे गूजरों की उग्र भीड़ पर फ़ायरिंग की जिसमें दो लोग मारे गए हैं।
इस घटना के बाद राज्य में 23 मई को शुरु हुए गूजरों के आंदोलन में मृतकों की संख्या 39 हो गई है.
मृतकों में एक पुलिसकर्मी भी है।
गुरुवार को हरियाणा के पानीपत ज़िले में भी गूजरों के प्रदर्शन के दौरान दो प्रदर्शनकारी मारे गए थे।
गूजर अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की माँग कर रहे हैं।
गूजर इस समय अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल हैं लेकिन उनका मानना है कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने पर वे नौकरियों और शिक्षा में मिलने वाली आरक्षण की सुविधा का बेहतर फ़ायदा उठा पाएँगे।
शवों की राजनीति
पहले आंदोलन में मारे गए लोगों के परिजन शव माँग रहे थे कि उनका अंतिम संस्कार किया जा सके और सरकार इसके लिए तैयार नहीं दिख रही थी।
अब मामला उलट गया है। अब सरकार चाहती है कि आंदोलन में मारे गए लोगों के शव का पोस्टमार्टम करवा दिया जाए और उन्हें परिजनों को सौंप दिया जाए लेकिन अब गूजर तैयार नहीं हैं।
दौसा में मारे गए 14 लोगों के शव जयपुर के सरकारी अस्पताल में हैं लेकिन गूजर इसे ले नहीं रहे हैं।
अपने एक रिश्तेदार को खो चुके बाबूलाल गूजर कहते हैं, "समाज का सर्वसम्मत फ़ैसला है कि पहले बयाना में रखे गए शवों का पोस्टमार्टम राज्य के बाहर के किसी डॉक्टर के हाथों करवाया जाए, उसके बाद सिकंदरा के शवों का। तभी शवों को अंतिम संस्कार के लिए लिया जाएगा।"
पीलूपुरा में रखे 12 शवों और सिकंदरा में रखे छह शवों का भी अभी फ़ैसला नहीं हो पाया है और ये शव गूजरों के कब्ज़े में हैं।
भाजपा के वरिष्ठ नेता और राजस्थान के प्रभारी गोपीनाथ मुंडे भी कह चुके हैं कि यदि गूजर तैयार हो जाएँ तो सरकार शवों का पोस्टमार्टम करवाकर उसे सौंपने के लिए तैयार है।
भरतपुर के भाजपा सांसद विश्वेंद्र सिंह गूजरों और सरकार के बीच वार्ता के लिए मध्यस्थता का प्रस्ताव दे चुके हैं और वे भी शवों की राजनीति पर चिंतित दिखते हैं।
वे कहते हैं, "अभी भी शव रखे हुए हैं। हिंदू संस्कृति में यह दुखद स्थिति मानी जाती है कि मृतकों का अंतिम संस्कार नहीं किया जा सके।"
लेकिन फ़िलहाल इसका कोई हल निकलता हुआ नहीं दिख रहा है।
बातचीत की पहल
इस बीच सरकार की ओर से गूजरों के बातचीत की अपील की गई है लेकिन गूजर फ़िलहाल इसके लिए तैयार नहीं दिख रहे हैं।
भरतपुर के राजघराने के विश्वेंद्र सिंह ने गूजरों से शांति बनाए रखने की अपील की है। वे भरतपुर से भाजपा सांसद भी हैं।
उन्होंने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि वार्ता के लिए सरकार और गूजरों के बीच मध्यस्थता के लिए तैयार हैं।
चाहे विश्वेंद्र सिंह जाट हैं लेकिन उनका उस क्षेत्र में काफ़ी प्रभाव है और वे एक गूजर परिवार के दामाद हैं। उनका दावा है कि उनके पास ऐसे उपाय हैं जिससे इस स्थिति का समाधान हो सकता है।
गुरुवार को दिल्ली और आसपास के इलाक़ों में रास्ता रोको आंदोलन के बाद राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने गूजरों को एक बार फिर वार्ता का प्रस्ताव दिया था।
उन्होंने कहा था कि गूजरों को घूमंतू जनजाति या 'डि-नोटिफ़ाइड ट्राइब' जैसी विशेष श्रेणी में रखकर आरक्षण दिए जाने की माँग पूरी तरह से संविधान सम्मत है।
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