Monday, November 5, 2007

Webinfosys's Hindi News : बदलेंगे, ताकि बदतर न हो बदलाव

एक ताज़ा सर्वेक्षण के अनुसार जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए लगभग 80 प्रतिशत लोग निजी हितों से समझौता करने को तैयार हैं.
सर्वेक्षण बताता है कि लोग जलवायु परिवर्तन को रोकने के प्रति अपनी जीवन शैली तक को बदलने के लिए तैयार हैं.
सर्वेक्षण में शामिल 21 देशों के 22 हज़ार लोग दुनियाभर में हो रहे जयवायु परिवर्तन को लेकर गंभीर और चिंतित दिखे.
अनुपात के हिसाब से देखें तो पाँच में से चार लोगों ने कहा कि वे जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निबटने के लिए अपने रहन-सहन में बदलाव लाने को तैयार हैं.
और तो और, वायुमंडल में सबसे ज़्यादा कार्बन डाई-ऑक्साइड छोड़ने वाले अमरीका और चीन जैसे देशों में रहने वाले भी इसके लिए तैयार हैं.
तीन चौथाई लोगों ने कहा कि वे ऊर्जा टैक्स भी देने को तैयार हैं अगर वह पैसा ऊर्जा के नए स्रोत की खोज या क्षमता बढ़ाने पर ख़र्च किया जाए. चीन के लोग ऊर्जा टैक्स को लेकर किसी और देश के लोगों से ज़्यादा सकारात्मक दिखे.

सरकार पीछे, लोग आगे

बीबीसी के पर्यावरण संवाददाता मैट मैकग्रैथ ने बताया कि सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है कि कई देशों में आम लोग जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सरकार से ज़्यादा तत्पर हैं.
सर्वेक्षण में शामिल 83 फ़ीसदी लोग इस राय के मिले कि जलवायु में बदलाव के लिए ज़िम्मेदार गैसों में कमी लाने के लिए लोगों को व्यक्तिगत तौर पर अपनी जीवन शैली को बदलना होगा.
इनमें से ज़्यादातर लोगों का मानना है कि पैदा हालात से निबटने के लिए निजी हितों की कुर्बानी की ज़रूरत होगी.
अमरीका और अधिकांश यूरोपीय देशों के लोगों का मानना था कि जलवायु परिवर्तन के बड़े कारक ईंधन की क़ीमत को बढ़ाना होगा.
रुस और इटली ही अपवाद रहे जहां ऐसे लोग ख़ासी संख्या में मिले जिनकी नज़र में ईंधन की क़ीमत बढ़ाने की आवश्यकता नहीं होगी.
चीन और इंडोनेशिया में ज़्यादातर लोगों ने माना कि ऊर्जा की ऊँची क़ीमत ज़रूरी है लेकिन भारत और दक्षिण कोरिया के अधिकांश लोगों इस राय के ख़िलाफ़ दिखे.




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