Wednesday, April 9, 2008

Webinfosys's Hindi News : संकट में है रेगिस्तान का जहाज़

राजस्थान मे ऊँटों की घटती संख्या ने सरकार को चिंता में डाल दिया है। सरकार ने अब ऊँटनी के दूध से बने उत्पाद को बाज़ार में लाने का काम अपने हाथ में ले लिया है।

साथ ही सरकार ने ऊँटों का बीमा कराने का भी फ़ैसला किया है ताकि उन्हें बचाया जा सके।

उधर केन्द्र सरकार ऊँटों के निर्यात पर विचार कर रही है। लेकिन राजस्थान ने इसके लिए साफ़ मना कर दिया है.

घटते चारागाह और यांत्रिक सुविधाओं के बोलबाले ने रेगिस्तान के इस जहाज़ को संकट में डाल दिया है। जानकारों के मुताबिक़ पिछले एक दशक में राजस्थान मे ऊँटों की तादाद आधी ही रह गई है।

ऊँटनी के दूध में कई बीमारियों का इलाज छिपा है। राज्य पशुपालन मंत्री प्रभुलाल सैनी ने बताया कि ऊँटनी का दूध मधुमेह से पीड़ित रोगियों को बड़ी राहत पहुंचाता है और इस बारे में कई अध्ययन हो चुके हैं।

लिहाज़ा सहकारी डेयरी ने ऊँटनी के दूध से बनी आइसक्रीम और ज़ायकेदार दूध बिक्री के लिए जारी किया है.

अभी इसे बीकानेर में जारी किया गया है। फिर इसे जयपुर और दिल्ली में भी लोगों को उपलब्ध कराया जाएगा।

घटती संख्या

सैनी कहते हैं, "ऊँटों की संख्या लगातार घट रही है. अभी ये चार लाख 98 हज़ार है. पहले ये सात लाख से ज़्यादा थे. हम ऊँटों और उनके पालकों का बीमा भी कर रहे हैं. शुरु मे पाँच हज़ार ऊँटों का बीमा होगा."

राज्य पशु कल्याण बोर्ड के मुखिया ओतारम देवासी कहते हैं, "जंगल रहे नहीं, चारागाह सिकुड़ गए और मशीन आ जाने से ऊँटों के सामने मुश्किल खड़ी हो गई है. हम प्रयास कर रहे है कि ऊँटों की उपयोगिता फिर से बने."

जयपुर में ऊँट गाड़ी चलाकर गुज़ारा करने वाले उदय सिंह कहते हैं, "अब ऊँट के ज़रिए गुज़ारा करना कठिन हो गया है क्योंकि ऊँटों को अब वाहनों से मुक़ाबला करना पड़ रहा है।"

उधर केन्द्र सरकार ऊँटों के निर्यात पर विचार कर रही है.

पशुपालन मंत्री श्री सैनी ने बताया, "केन्द्र ने हमसे हमारी राय मांगी है। हमने साफ़ कह दिया है कि ऊँटों को शोध, सांस्कृतिक मेलों या सजावट जैसे कामों में तो भेजा जा सकता है। अन्य किसी काम के लिए नहीं क्योंकि इन्हें अब बचाना ज़रुरी है।"

रेगिस्तान का जहाज़

राजस्थान मे ऊँट सदियों तक रेगिस्तान में काम आता रहा है। बीकानेर रियासत दौर में ऊँट शाही सेना में साथ चलता था और सेना में 'गंगा रिसाला' नाम से इसके अलग शाखा थी।

बाद में ये 'गंगा रिसाला' ब्रिटिश सेना का हिस्सा भी बना और विश्व युद्ध में भी भाग लिया।

इस समय ऊँट भारत पाकिस्तान की सरहद पर सीमा रक्षकों के साथ सुरक्षा में भी अपनी अहम भूमिका अदा करता है।

थार मरुस्थल के विकट जीवन में ऊँट ने सैंकडों सालों तक इंसान का साथ दिया है, क्या अब इंसान संकट में फँसे अपने पुराने साथी को यूं ही छोड़ देगा?





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