Saturday, March 15, 2008

Webinfosys's Hindi News : प्रदर्शनों के लिए दलाई लामा को दोष

तिब्बत की राजधानी ल्हासा में पिछले बीस सालों में सबसे हिंसक चीन विरोधी दंगे और हिंसक प्रदर्शन हुए हैं.

प्रदर्शनकारियों ने पुराने शहर में इमारतों में आग लगा दी है, चीनी मूल के व्यापारियों की दुकानें लूट ली गई हैं और उनकी दुकानों को नष्ट कर दिया गया है।

ल्हासा से मिल रही तस्वीरों में सड़कों पर उल्टी पड़ी कारें दिख रही हैं, यहाँ-वहाँ आग लगने के बाद उठता काला धुँआ दिख रहा है और सड़कों पर चीनी फ़ौजें और बख़्तरबंद गाड़ियाँ दिखाई दे रही हैं।

इन हिंसक प्रदर्शनों में कम से कम दस लोगों के मारे जाने की ख़बरें हैं. चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने कहा है कि मारे गए सभी लोग व्यावसायी हैं।

चीन सरकार ने इन उग्र प्रदर्शनों के लिए तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रमुख और धार्मिक नेता दलाई लामा को दोषी ठहराया है।

लेकिन दलाई लामा के प्रवक्ता ने दिल्ली में इन आरोपों का खंडन किया है।

इस बीच ख़बरें मिल रही हैं कि तिब्बत के घटनाक्रम से चीन के लोग नावाकिफ़ हैं क्योंकि सरकार ने इन ख़बरों को सेंसर कर दिया है।

पिछले सोमवार से तिब्बती लोगों का प्रदर्शन ऐसे समय में शुरु हुआ है जब चीन सरकार ओलंपिक की तैयारियों में लगी हुई है।

इस बीच अमरीका और यूरोपीय संघ ने घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि चीन को तिब्बत के निर्वासित नेता दलाई लामा से बात करनी चाहिए।

हिंसक प्रदर्शन

इस बीच तिब्बति प्रदर्शनकारी विरोध प्रदर्शनों को आगे बढ़ाने की तैयारियाँ कर रहे हैं।

लेकिन चीनी प्रशासन ने कहा है कि 'अलगाव की षडयंत्र' से सख़्ती से निपटा जाएगा।

चीन प्रशासन ने इन ख़बरों का खंडन किया है कि वहाँ प्रदर्शनकारियों पर सुरक्षाबलों ने गोलियाँ चलाई हैं।

उल्लेखनीय है कि शुक्रवार को ल्हासा में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच हुए संघर्ष में कई लोगों की मौत हुई है और अनेक घायल हुए हैं।

अमरीकी रेडियो फ्री एशिया को प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि उन्होंने ल्हासा की सड़कों पर दो लोगों के शव पड़े देखे हैं।

उधर भारत की राजधानी दिल्ली में पुलिस ने ऐसे लगभग 50 तिब्बती प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार कर लिया जिन्होंने चीनी दूतावास में घुसने की कोशिश की।

अशांत स्थिति

मानवाधिकार संगठनों और प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि ल्हासा में बौद्ध भिक्षुओं के इस सप्ताह शुरू हुए विरोध के बाद सुरक्षा बलों ने शुक्रवार को तीन बौद्ध मठों को घेर लिया।

चश्मदीदों का कहना था कि गुरुवार को ड्रेपुंग और सेरा मठों में पुलिस पहुँच गई. अमरीका से काम करने वाले एक मानवाधिकार संगठन का कहना है कि गंडेन में एक तीसरे मठ को भी घेरा गया।

चीनी शासन के विरोध में बौद्ध भिक्षुओं के दो दिनों तक चले विरोध के बाद यह क़दम उठाया गया।

गुरुवार को चीन ने बौद्ध भिक्षुओं के प्रदर्शन की बातें तो मानी थीं लेकिन यह भी कहा था कि हालात स्थिर हैं।

तिब्बत से किसी भी ख़बर की पुष्टि कर पाना मुश्किल है क्योंकि वहाँ मीडिया और आने-जाने वालों पर कड़ा सरकारी नियंत्रण है।

ख़बरें हैं कि प्रदर्शन की ख़बरों को चीन सरकार ने देशी मीडिया पर सेंसर कर दिया है. सरकारी टेलीविज़न सीसीटीवी पर इन प्रदर्शनों की कोई ख़बर नहीं दिखाई गई।

इस बीच विदेशी चैनलों पर नज़र रखी जा रही है. 'बीबीसी वर्ल्ड' भी नहीं दिखाया जा रहा है।

संवाददाताओं का कहना है कि जब भी तिब्बत का ज़िक्र होता है तो चीन सरकार का रवैया आमतौर पर ऐसा ही होता है।

लामा पर दोष

चीन ने ल्हासा की घटनाओं के लिए दलाई लामा को ज़िम्मेदार ठहराया है।

चीन के सरकारी मीडिया ने कहा है कि ये प्रदर्शन 'पूर्वनियोजित' थे और इसके पीछे दलाई लामा हैं।

लेकिन दलाई लामा के प्रवक्ता चाइम आर छोयकयापा ने दिल्ली में इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया है।

उनका कहना है कि चीन सरकार तिब्बतियों की समस्या को बंदूक से नहीं सुलझा सकती और उसे तिब्बतियों का मन पढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।

उधर तिब्बतियों के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने कहा है कि ल्हासा की स्थिति को लेकर वो गंभीर रूप से चिंतित हैं।

दलाई लामा ने एक प्रेस वक्तव्य जारी करके चीन से माँग की है वह ल्हासा में बर्बर तरीके से बलप्रयोग करना बंद ।

उन्होंने कहा है कि तिब्बतियों ने जो प्रदर्शन किए हैं वो चीनी शासन के ख़िलाफ़ लंबे समय से चले आ रहे असंतोष का प्रतीक हैं।




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