सरकार पिछले महीने से कोशिश कर रही है कि वामदल कम से कम अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के साथ सुरक्षा समझौते की अनुमति दे दें।
लेकिन इस बैठक से पहले भी वामदलों से साफ़ कर दिया है कि वे ऐसी किसी अनुमति के पक्ष में नहीं हैं क्योंकि वे मानते हैं कि आईएईए से समझौता दरअसल परमाणु समझौते को हरी झंडी देने जैसा होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु समझौते पर वामपंथी दलों को मनाने के लिए सरकार के पास आख़िरी मौक़ा है और इसके बाद उसे कोई निर्णय लेना ही होगा।
यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दलों का कहना है कि अमरीका के साथ परमाणु समझौता देशहित में नहीं है और अगर सरकार इस पर आगे क़दम बढ़ाती है तो वे सरकार से समर्थन वापस ले लेंगे।
माना जा रहा है कि अगले महीने जी-8 देशों की बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मुलाक़ात अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश से होने वाली है और इससे पहले यूपीए सरकार कोई फ़ैसला लेना चाहती है।
वामदलों का रुख़ वही
पिछले साल नवंबर में यूपीए-वामदलों की समिति के गठन के बाद से यह नौवीं बैठक है।
इस बैठक से पहले यूपीए-वामदलों की समिति के संयोजक और विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने सोमवार की शाम मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के महासचिव प्रकाश कारत से मुलाक़ात की थी।
हालांकि दोनों नेता इस बैठक के विवरण नहीं दे रहे हैं।
लेकिन ख़बरें हैं कि प्रणव मुखर्जी ने सीपीएम नेता को एक बार फिर मनाने की कोशिश की कि वे आईएईए के साथ समझौते की अनुमति दे दें। लेकिन उन्होंने इसे एक बार फिर ठुकरा दिया है।
इसके बाद मंगलवार को प्रकाश कारत ने अपने सहयोगी दल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के महासचिव एबी बर्धन से मुलाक़ात की थी।
इस बैठक के बाद हालांकि एबी बर्धन ने कहा कि दोनों के बीच परमाणु मसले पर कोई बात नहीं हुई लेकिन उन्होंने यह साफ़ कर दिया कि कुछ नहीं बदला.
समाचार एजेंसियों के अनुसार उन्होंने कहा, "हमारे रुख़ की जानकारी सबको है। उसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है और बुधवार की बैठक में भी हमारा यही रुख़ रहेगा।"
यह पूछने पर कि क्या यह यूपीए-वामपंथी दलों की आख़िरी बैठक होगी, उन्होंने कहा, "मैं नहीं जानता कि आख़िरी बैठक जैसी कोई बात है।"
'आख़िरी मौक़ा'
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सिद्धार्थ वरदराजन मानते हैं कि वामपंथियों के साथ मिलकर किसी नतीजे तक पहुँचने के लिए सरकार के पास आख़िरी मौक़ा है।
उनका कहना है कि सरकार यदि इस पर आगे बढ़ने का मन बनाती भी है तो पहले आईएईए के साथ समझौते के लिए एक महीने चाहिए होगा और फिर परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों (एनएसजी) से समझौते में दो महीने लगेंगे।
सिद्धार्थ वरदराजन का कहना है कि यदि इससे देर हुई को जॉर्ज बुश के कार्यकाल में इसके पूरा होने की संभावना नहीं बचेगी।
आईएईए से समझौते के लिए वामदलों की आपत्ति पर वे कहते हैं कि वामदलों को ऐसा लगता है कि यदि आईएईए से समझौता हो गया तो फिर अमरीका ही इसे लेकर एनएसजी के पास चला जाएगा और वही होने लगेगा जिसका वो विरोध कर रहे हैं, तो वामदल ग़लत भी नहीं सोच रहे हैं।
उनका कहना है कि यूपीए के लोगों को आईएईए से समझौते पर वामदलों से थोड़ी नरमी की उम्मीद थी लेकिन उनका रुख़ देखकर लगता है कि बुधवार की बैठक के सफल होने की संभावना कम ही है।
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