इस बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने एक बयान जारी करके "ज़िम्बाब्वे में जारी हिंसा की राजनीति और विपक्षी पार्टी को प्रचार का अवसर न दिए जाने" की कड़ी आलोचना की है।
बान की मून ने कहा कि मुख्य विपक्षी नेता के फ़ैसले की वजह सबकी समझ में आती है, उन्होंने सरकार की कथित मनमानी और हिंसा की राजनीति की निंदा की।
ज़िम्बाब्वे के चुनाव अधिकारियों ने घोषणा की है कि शुक्रवार को पहले से तय कार्यक्रम के मुताबिक़ राष्ट्रपति चुनाव कराए जाएँगे।इस बीच मूवमेंट फॉर डेमोक्रेटिक चेंज (एमडीसी) के नेता मार्गन चांगिराई ने हरारे में डच दूतावास में शरण ली है।
डच दूतावास के प्रवक्ता ने कहा है कि चांगिराई अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं लेकिन उन्होंने शरण की माँग नहीं की है।
एक डच मंत्री ने बताया कि चांगिराई शांति से अपने अगले क़दम की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि उनका अगला क़दम क्या होगा।
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने कहा, "अगर तय कार्यक्रम पर चुनाव होते हैं तो इससे देश में विभाजन की दरार गहरी होगी और चुनाव परिणाम विश्वसनीय नहीं होंगे। ज़िम्बाब्वे में स्वंतत्र और निष्पक्ष चुनाव का वातावरण नहीं है, हिंसा और आतंक का माहौल है। पूरी दुनिया ने देखा है कि वहाँ कितनी हिंसा हो रही है।"
कई अफ़्रीकी देशों के नेताओं से बातचीत के बाद बान की मून ने कहा कि ज़िम्बाब्वे की सरकार को बहुत साफ़ शब्दों में कहा कि वह चुनाव टाल दे।
क्षेत्रीय राजनीति
बान की मून ने ज़िम्बाब्वे के मामले कोक्षेत्रीय स्थिरता का मसला बताते हुए कहा है कि इसके परिणाम ज़िम्बाब्वे की सीमा से बाहर होंगे।
विपक्षी नेता को उम्मीद है कि उसके पड़ोसी देश राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे पर दबाव बनाएँगे लेकिन पड़ोसी देश अब तक मुगाबे का ही बचाव करते रहे हैं।
ज़िम्बाब्वे के पड़ोसी देश दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति थाबो एम्बेकी इस मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभाते रहे हैं लेकिन उन्होंने रॉबर्ट मुगाबे की आलोचना नहीं की है।
ज़ाम्बिया के राष्ट्रपति लेवी वानावासा ने अब तक सबसे सख़्त बयान दिया है और उन्होंने ज़िम्बाब्वे के घटनाक्रम को शर्मनाक बताया है।
नामीबिया, बोत्सवाना, अंगोला जैसे सभी देशों ने हिंसा की आलोचना तो की है लेकिन चुनाव के बारे में कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया है।
मोज़ाम्बिक ने ज़िम्बाब्वे से निकाले गए कुछ गोरे किसानों को पनाह दी है और माना जाता है कि वह विपक्षी आंदोलन से सहानुभूति रखता है।
तंज़ानिया और कांगो परंपरागत रुप से मुगाबे के समर्थक रहे हैं जबकि मलावी ने निष्पक्ष रवैया अख़्तियार कर रखा है।
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